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पूजा पाठ

मंत्र जाप की माला में मनकों की संख्या 108 या 54 ही क्यों होती है |

मंत्र जाप की माला में मनकों की संख्या 108 या 54 ही क्यों होती है |

पूजा पाठ
मंत्र जाप माला में मनकों की संख्या 108 या 54 ही क्यों होती है,यह प्रश्न आपके मस्तिष्क में कई बार आया होगा.विभिन्न प्रयोजनों की पूर्ति हेतु विभिन्न मंत्रों की जाप संख्या भी परिवर्तित हो सकती है जैसे  कुछ ग्यारह सौ तो कुछ मंत्र सवा लाख जप संख्या के भी होते है.किन्तु मनकों की संख्या जप हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है.यही कारण है की अधिकतर मालाओ में मनको की संख्या 108 या 54  होती है | ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंत्र जाप में मनकों की संख्या हमारे ग्रहों की संख्या के आधार पर मानी गयी है, वैसे तो बहुत सारे ग्रह हमारे सौर मंडल में हैं परन्तु9 ग्रह मुख्य होते हैं इन्ही ग्रहों की संख्या पर मनकों की संख्या निर्धारित की गयी है | यदि हम 108 का जोड़ करें तो 9 ही आयेगा और यदि 54 का जोड़ करें तो भी 9 ही आयेगा | 108 = 1+0+8 = 9 54 = 5+4 = 9 इस प्रकार 9 ग्रहों और सारे देवी देवताओं को प्रसन्न करने के ल
पूजा साधना में विशेष रूप से ध्यान रखें ये बातें

पूजा साधना में विशेष रूप से ध्यान रखें ये बातें

पूजा पाठ
पूजा साधना करते समय बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन पर सामान्यतः हमारा ध्यान नही जाता है लेकिन पूजा साधना की द्रष्टि से ये बातें अति महत्वपूर्ण हैं |  गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं | भैरव की पूजा में तुलसी का ग्रहण नही है| कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोडकर निषेध है | बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नही करते | रविवार को दूर्वा नही तोडनी चाहिए | केतकी पुष्प शिव को नही चढ़ाना चाहिए | केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें | देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नही चाहिए | शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नही होता |   जो मूर्ति स्थापित हो उसमे आवाहन और विसर्जन नही होता | तुलसीपत्र को मध्याहोंन्त्तर ग्रहण न करें | पूजा करते समय यदि गुरुदेव ,ज्येष्ठ व्यक्ति
जप – पूजन – साधना – उपासना में विभिन्न शब्दों का अर्थ जानें

जप – पूजन – साधना – उपासना में विभिन्न शब्दों का अर्थ जानें

पूजा पाठ
मंत्र- जप , देव पूजन तथा उपासना के संबंध में प्रयुक्त होने वाले कुछ विशिष्ट शब्दों का अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए –  पंचोपचार – गन्ध , पुष्प , धूप , दीप तथा नैवैध्य द्वारा पूजन करने को ‘पंचोपचार’ कहते हैं | पंचामृत – दूध , दही , घृत , मधु { शहद ] तथा शक्कर इनके मिश्रण को ‘पंचामृत’ कहते हैं | पंचगव्य – गाय के दूध , घृत , मूत्र तथा गोबर इन्हें सम्मिलित रूप में ‘पंचगव्य’ कहते हैं | षोडशोपचार – आवाहन् , आसन , पाध्य , अर्घ्य , आचमन , स्नान , वस्त्र , अलंकार , सुगंध , पुष्प , धूप , दीप , नैवैध्य , ,अक्षत , ताम्बुल तथा दक्षिणा इन सबके द्वारा पूजन करने की विधि को ‘षोडशोपचार’ कहते हैं | दशोपचार – पाध्य , अर्घ्य , आचमनीय , मधुपक्र , आचमन , गंध , पुष्प , धूप , दीप तथा नैवैध्य द्वारा पूजन करने की विधि को ‘दशोपचार’ कहते हैं | त्रिधातु – सोना , चांदी और लोहा |कुछ आचार्य सोना , चांदी