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वास्तु

फेंगशुई वास्तु

फेंगशुई वास्तु

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फेंगशुई क्या है ? चीन में जो वास्तु शास्त्र की पद्धति विकसित हुई उसे फेंगशुई कहा जाता है | फेंगशुई चीनी भाषा के दो शब्द फेंग और शुई से मिलकर बना है | जिसमे फेंग का अर्थ है "जल" और शुई का अर्थ है "वायु"  | फेंगशुई में "ची" की महत्ता है | ची वह अदृश्य शक्ति है जो सभी निर्जीव और सजीव पदार्थों में पाई जाती है | निर्जीव पदार्थों में यह उस पदार्थ विशेष का निर्माण करती है | जबकि सजीव पदार्थों में यह प्राणऊर्जा के रूप में होती है | ची निराकार है अदृश्य है परन्तु अदभुत है | यिन-यांग क्या है ? प्रतिकूल और अनुकूल शक्तियां एकसाथ मिलकर उर्जाओं का निर्माण करती हैं | यिन और यांग ऐसी दो विरोधी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो अपनी निरंतर क्रियाओं से एक-दूसरे पर हावी होने का प्रयास करती हैं , जहाँ एक हावी हो जाती है, वहां असंतुलन हो जाता है | कोई एक ही वस्तु यिन भी हो सक
भवन के अन्दर वास्तु

भवन के अन्दर वास्तु

वास्तु
भवन के अन्दर की वास्तु इस प्रकार होनी चाहिए रसोई:--  रसोई आग्नेय कोण में होनी चाहिए | यदि ऐसा संभव न हो तो पश्चिम दिशा में भी बनाई जा सकती है | खाना बनाते समय , बनाने वाले का मुंह पूर्व दिशा में होना चाहिए | पूजागृह:- पूजागृह ईशान कोण , उत्तर अथवा पूर्व दिशा में होना चाहिए | कभी भी शयन कक्ष में पूजागृह न बनायें | फर्श पीला या सफ़ेद बनायें | भवन के पूजागृह में किसी प्राचीन मंदिर से लायी मूर्ति कभी न रखें | मूर्तियाँ एक दूसरे की ओर मुख करके बिलकुल भी न रखें | स्वागत कक्ष:-- कक्ष में भारी सामान पश्चिम या दक्षिण दिशा में रखा जाना चाहिए | कक्ष में पशु-पक्षियों के चित्र, स्त्रियों के चित्र, रोते हुए बच्चे का चित्र अथवा युद्ध के चित्र नहीं लगाने चाहिए | शयन कक्ष:-- गृह स्वामी का शयन कक्ष दक्षिण-पश्चिम कोण में अथवा पश्चिम दिशा में होना चाहिए | यदि भवन में एक
वास्तु के मुख्य सिद्धांत

वास्तु के मुख्य सिद्धांत

वास्तु
वास्तु के मुख्य सिद्धांत १. भवन में जल ईशान , पूर्व या उत्तर दिशा से आना चाहिए | और इन्ही दिशाओं से बाहर जाना चाहिए | २. रसोईघर आग्नेय कोण में होना चाहिए | बिजली का मेन बोर्ड आग्नेय कोण में ही होने चाहिए | ३. भवन में वायु का प्रवाह वायव्य कोण से होना चाहिए | भवन में द्वार और खिड़कियाँ हमेशा सम संख्या में बनाएँ | ४. भवन के दक्षिणी एवं पश्चिमी भाग , उत्तरी एवं पूर्वी भाग से अधिक भारी होने चाहिए | ५. भवन का दक्षिणी और पश्चिमी भाग उत्तर और पूर्वी भाग से अधिक ऊँचा होना चाहिए |
वास्तु अनुसार वेध दोष

वास्तु अनुसार वेध दोष

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वास्तु अनुसार वेध दोष १. लोग मंदिर के निकट भवन का होना अच्छा मानते हैं | किन्तु वास्तुशास्त्र के अनुसार मंदिर के भवन की कुछ स्तिथियाँ दोषपूर्ण मानी जाती हैं | अ. भवन की ऊँचाई से दोगुनी दूरी तक भवन के निकट, सामने अथवा पीछे मंदिर नहीं होना चाहिए | ब. यदि भवन के सामने मंदिर है तो उसकी छाया भवन पर नहीं पड़नी चाहिए | स. भवन के मुख्य द्वार के सामने मंदिर नहीं होना चाहिए | २. भवन के निकट या मुख्य द्वार के सामने कीचड़ नहीं होना चाहिए | ३. पूर्व, उत्तर व ईशान कोण में कोई चट्टान या खम्भा नहीं होना चाहिए | ४. भवन के निकट दक्षिण या पश्चिम दिशा में कोई नदी , नाला नहीं होना चाहिए |  ५. भवन के निकट वृक्ष इतनी दूरी पर होने चाहिए, कि उनकी छाया भवन पर न पड़े | ६. भवन के मुख्य द्वार के सामने कोई बाधा नहीं होनी चाहिए | जैसे - दीवार, खम्भा,
वास्तु- भूमि एवं भूखंड चयन

वास्तु- भूमि एवं भूखंड चयन

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भवन के लिए भूखण्ड के आकार का चयन  भवन निर्माण के लिए विभिन्न आकार के भूखण्ड मिलते हैं | वास्तुशास्त्र अनुसार विभिन्न आकारों के भूखण्ड के गुण , दोष एवं फल का विचार किया जाना अत्यन्त आवश्यक है | शुभ फलदायक आकार के भूखण्ड १. वर्गाकार भूखण्ड :- जिस भूखण्ड की लम्बाई और चौड़ाई बराबर हो और उसके चारों कोण समकोण हों तो उस भूखण्ड को वर्गाकार भूखण्ड कहा जाता है | यह भूखण्ड भवन निर्माण के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है | इस भूखण्ड पर भवन निर्माण कर निवास करने से धनलाभ व आरोग्य वृद्धि होती है | २. आयताकार भूखण्ड :-जिस भूखण्ड की चार भुजाएं हों, आमने-सामने की भुजाएं बराबर हों तथा चारों कोण समकोण हों तो उस भूखण्ड को आयताकार भूखण्ड कहा जाता है | यह ध्यान रखें कि इस प्रकार के भूखण्ड की लम्बाई, चौड़ाई के दुगने से अधिक न हो | यह भूखण्ड भवन निर्माण के लिए श्रेष्ठ भूखण्ड ह
वास्तु- भूमि परीक्षण

वास्तु- भूमि परीक्षण

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भूमि परीक्षण भूमि का परीक्षण करना आवश्यक है | ये दो प्रकार से होता है | १. भूखण्ड के उत्तर दिशा के कोण में लगभग डेढ़ फुट गहरा व चौड़ा गड्ढा खोदें और उसमे से सारी मिट्टी निकालकर उस निकाली गयी मिट्टी से गड्ढे को पुनः भरें | यदि गड्ढा भरने पर मिट्टी शेष बचती है अर्थात अधिक निकलती है तो वो भूमि अच्छी है | ऐसी भूमि पर भवन निर्माण बहुत शुभ फलदायी होगा | यदि मिट्टी शेष नहीं बचती और पूरी पड़ जाती है तो भूमि मध्यम होगी | इस पर भी भवन निर्माण किया जा सकता है | अब यदि मिट्टी न तो शेष बचती है और नाही पूरी पड़ती है बल्कि कम पास जाती है तो वो भूमि भवन निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है | २. जिस भूमि का परीक्षण करना हो, उसमे डेढ़ फुट गड्ढा खोदकर उस गड्ढे में ऊपर तक पानी भर दीजिये | और फिर दो मिनट बाद देखिये यदि पानी जितना भरा था उतना ही हो तो भूमि भवन निर्माण के लिए अत
भवन वास्तु व्यवस्था से अर्थलाभ

भवन वास्तु व्यवस्था से अर्थलाभ

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भवन निर्माण की वास्तु व्यवस्था से जीवन में प्राप्त होने वाली अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण रूप से सम्बन्ध होता है | भूखण्ड पर होने वाले निर्माण में कुछ स्थल ऐसे होते हैं जो धन लाभ या धन हानि के दृष्टिकोण से संवेदनशील माने जाते हैं | उन स्थलों पर निर्माण वास्तुनुसार करवाना हितकर रहता है | इस सन्दर्भ में वास्तु व्यवस्था से सम्बंधित कुछ उपयोगी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया जा रहा है – यदि पूर्वी भाग में चबूतरा अथवा बरामदा बनवाना हो तो बरामदे का तल एवं छत नीची होनी चाहिए | यदि उत्तरी भाग में बरामदा बनवाना हो तो बरामदे की छत एवम फर्श नीचा होना चाहिए | यदि उत्तर-पूर्वी भाग के उत्तरी भाग में मार्ग प्रहार हो तो यह शुभ संकेत माना जाता है | वर्षा का जल यदि भूखंड के उत्तरी-पूर्वी भाग से निकलता हो तो यह शुभ लक्षण माना जाता है | उत्तर-पूर्वी भाग में शौचालय का निर्माण कदापि न